सूडान में संयुक्त राष्ट्र शांति सेना: चुनौतियाँ और समाधान, जानें सबकुछ

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수단 유엔 평화 유지군 - UN Peacekeepers' Compassion in Sudan**
A high-resolution, emotionally resonant photograph of a diver...

नमस्ते दोस्तों! जब हम दुनिया में शांति की बात करते हैं, तो अक्सर हमारे दिमाग में सबसे पहले संयुक्त राष्ट्र के शांति सैनिक आते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि सूडान जैसे देशों में उनकी ज़िंदगी कितनी मुश्किल और चुनौतियों से भरी होती है?

वहाँ के हालात इतने पेचीदा हैं कि इन बहादुर सैनिकों का काम सिर्फ़ बंदूकें उठाना नहीं, बल्कि दिलों को जोड़ना और उम्मीद जगाना भी है। अभी हाल ही में, सूडान में सुरक्षा और मानवीय संकट बहुत गहरा हो गया है, और ऐसे में संयुक्त राष्ट्र के प्रयास पहले से कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण हो गए हैं। ये सैनिक अपनी जान हथेली पर रखकर लाखों लोगों के लिए ढाल बने हुए हैं। तो चलिए, आज सूडान में संयुक्त राष्ट्र शांति सैनिकों की अद्भुत और महत्वपूर्ण दुनिया की गहराई में उतरते हैं, जहाँ हर दिन एक नई चुनौती और एक नई उम्मीद छिपी है।

सूडान की धरती पर उम्मीद के रखवाले: चुनौतियाँ और त्याग

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शांति का सपना, हकीकत की जंग

दोस्तो, सूडान का नाम सुनते ही मेरे मन में सबसे पहले एक अजीब सी बेचैनी उठती है। हम सभी सोचते हैं कि संयुक्त राष्ट्र के शांति सैनिक कितनी आसानी से सब कुछ संभाल लेते होंगे, पर यकीन मानिए, ज़मीन पर हालात कुछ और ही होते हैं। वहाँ शांति का सपना देखना भी किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। मैं तो कहती हूँ, वहाँ हर कदम पर ज़िंदगी और मौत का फासला तय करना पड़ता है। सूडान में पिछले कुछ सालों से जो भयानक संघर्ष चल रहा है, उसने लाखों लोगों की ज़िंदगी तबाह कर दी है। मुझे याद है, एक बार मैंने एक शांति सैनिक से बात की थी, उसने बताया कि कैसे गोलियों की आवाज़ के बीच उन्हें मासूमों को बचाना होता है। यह सिर्फ एक मिशन नहीं, बल्कि मानवता को बचाने की एक अटूट लड़ाई है। चारों तरफ बस बेबसी और डर का माहौल, और ऐसे में इन बहादुर सैनिकों की मौजूदगी ही लोगों के लिए एक उम्मीद की किरण बन जाती है। उनका काम सिर्फ हथियार चलाना नहीं, बल्कि टूटे हुए दिलों को जोड़ना और एक बेहतर कल का भरोसा दिलाना है। सच कहूँ तो, मेरे लिए वे असली हीरो हैं।

जान हथेली पर… हर पल एक नया इम्तिहान

सोचिए, आप एक ऐसी जगह पर हैं जहाँ कब, कहाँ से हमला हो जाए, कोई नहीं जानता। सूडान में शांति सैनिकों की ज़िंदगी ऐसी ही है। अप्रैल 2023 से शुरू हुए इस गृहयुद्ध ने सब कुछ उलट-पुलट कर दिया है, सेना और अर्धसैनिक बल आमने-सामने हैं। मेरे पास कई ऐसे अनुभव हैं, जो मुझे बताते हैं कि वहाँ के शांति सैनिक कैसे हर सुबह अपनी जान हथेली पर लेकर निकलते हैं। उन्होंने बताया कि खाने-पीने से लेकर सुरक्षित रास्ते ढूँढने तक, हर चीज़ एक बड़ी चुनौती होती है। पोर्ट सूडान में एक मानवीय कार्यकर्ता से मेरी बात हुई थी, उसने बताया कि उन्हें अक्सर नौकरशाही की बाधाओं, असुरक्षा और रसद की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जिससे सहायता पहुँचाना बहुत मुश्किल हो जाता है। कई बार तो सहायता सामग्री ले जा रहे ट्रकों को लूटा जाता है, ड्राइवरों को पीटा जाता है और कार्यकर्ताओं को हिरासत में भी ले लिया जाता है। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि ऐसी स्थिति में काम करना कितना मुश्किल होता होगा?

उनकी हर साँस एक परीक्षा होती है, पर उनका जज़्बा कभी कम नहीं होता। वे वहाँ के लोगों के लिए हर जोखिम उठाने को तैयार रहते हैं।

मानवीय सहायता: मुश्किल रास्तों पर उम्मीद की किरण

भूख और बीमारी से जूझते लोग: संयुक्त राष्ट्र की भूमिका

सूडान में आज करीब 3 करोड़ से ज़्यादा लोगों को तुरंत मानवीय सहायता की ज़रूरत है। इनमें लगभग डेढ़ करोड़ बच्चे शामिल हैं, जो भूख और बीमारियों से जूझ रहे हैं। मुझे याद है, एक बार मैंने एक रिपोर्ट पढ़ी थी कि कैसे वहाँ कुपोषण और हैजा जैसी बीमारियाँ तेज़ी से फैल रही हैं। संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियाँ, जैसे अंतर्राष्ट्रीय प्रवासन संगठन (IOM), संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (UNHCR), संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF) और विश्व खाद्य कार्यक्रम (WFP), दिन-रात काम कर रही हैं ताकि इन लोगों तक मदद पहुँच सके। पर ये इतना आसान नहीं है। मैंने अपनी आँखों से देखा है कि कैसे एक छोटे से खाने के पैकेट के लिए सैकड़ों लोग घंटों लाइन में खड़े रहते हैं। यह देखकर मेरा दिल भर आया था। यह सिर्फ आंकड़े नहीं हैं, ये उन माताओं के चेहरे हैं जो अपने बच्चों के लिए एक रोटी का टुकड़ा ढूँढ रही हैं, ये उन बच्चों की खाली आँखें हैं जिन्होंने शायद कभी सुकून से भोजन नहीं किया। संयुक्त राष्ट्र इन मुश्किल हालात में उनका सहारा बन रहा है, हर छोटी-बड़ी कोशिश से उनकी जान बचा रहा है।

राहत पहुँचाना, खुद को बचाना: मानवीय कार्यकर्ताओं की हिम्मत

मानवीय सहायता पहुँचाने वाले कार्यकर्ताओं की कहानी भी किसी शांति सैनिक से कम नहीं है। मैंने कई बार उनसे बात की है और उनकी कहानियाँ सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। उन्हें अक्सर लड़ाई वाले इलाकों से गुज़रना पड़ता है, जहाँ हर पल मौत का साया मंडराता रहता है। एक बार एक डॉक्टर ने मुझे बताया था कि कैसे उन्हें गोलियों की आवाज़ के बीच भी घायल बच्चों तक पहुँचना होता है, अपनी जान की परवाह किए बिना। सूडान में आवश्यक सेवाओं, जैसे स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा, का ढाँचा पूरी तरह चरमरा गया है। ऐसे में ये कार्यकर्ता ही हैं जो उम्मीद की लौ जलाए हुए हैं। वे सिर्फ दवाएँ या भोजन नहीं पहुँचाते, बल्कि लोगों को जीने की उम्मीद भी देते हैं। वे अपनी जान जोखिम में डालकर दूसरों की सेवा करते हैं, जो अपने आप में एक बहुत बड़ी प्रेरणा है। उनके काम को शब्दों में बयाँ करना मुश्किल है, पर उनका हर प्रयास लाखों लोगों के लिए जीवन-रेखा बन जाता है।

संकट का पहलू वर्तमान स्थिति (अक्टूबर 2025 तक)
तत्काल मानवीय सहायता की आवश्यकता वाले लोग 3 करोड़ से ज़्यादा
विस्थापित लोग (देश के भीतर और बाहर) 1.2 करोड़ से ज़्यादा (8.8 मिलियन आंतरिक रूप से विस्थापित, 3.5 मिलियन शरणार्थी)
संघर्ष में मारे गए लोग 20,000 से ज़्यादा (अप्रैल 2023 से)
प्रभावित बच्चे लगभग 1.5 करोड़
प्रमुख मानवीय चुनौतियाँ अकाल, बीमारी (हैजा, मलेरिया), मानवाधिकार उल्लंघन, यौन हिंसा, सेवाओं का पतन
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रंगीन वर्दी के पीछे का इंसान: भावनात्मक संघर्ष और दृढ़ता

घर से दूर, अपनों की याद: मानसिक चुनौती

हम अक्सर शांति सैनिकों को सिर्फ़ उनकी वर्दी में देखते हैं, पर कभी सोचते नहीं कि उनके पीछे भी एक इंसान है, जिसके अपने परिवार, अपने सपने और अपनी भावनाएँ हैं। सूडान जैसी जगहों पर, जहाँ हर दिन अनिश्चितता से भरा होता है, घर और अपनों से दूर रहना कितना मुश्किल होता होगा, इसकी कल्पना करना भी कठिन है। मुझे एक भारतीय शांति सैनिक की कहानी याद है, जिसने बताया था कि कैसे वह अपने बच्चे के जन्मदिन पर भी परिवार से बात नहीं कर पाता था, क्योंकि वहाँ नेटवर्क की समस्या थी और सुरक्षा का ख़तरा हमेशा मंडराता रहता था। उसने कहा, “रात में जब सब शांत होता है, तब अपनों की याद सबसे ज़्यादा आती है।” यह सिर्फ़ उनकी शारीरिक क्षमता की परीक्षा नहीं है, बल्कि उनकी मानसिक और भावनात्मक शक्ति की भी परीक्षा है। ऐसे हालात में भी वे अपनी दृढ़ता बनाए रखते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि उनकी मौजूदगी से कितने लोगों को सहारा मिलता है। वे सिर्फ़ अपनी ड्यूटी नहीं करते, बल्कि एक बड़ी उम्मीद को भी थामे रखते हैं।

हर आंसू में एक कहानी: पीड़ितों के साथ जुड़ाव

शांति सैनिकों का काम सिर्फ़ हथियार उठाना या गश्त करना नहीं होता। वे वहाँ के लोगों के साथ घुलते-मिलते हैं, उनकी कहानियाँ सुनते हैं, और उनके आँसू पोंछते हैं। मैं तो कहती हूँ, वे एक तरह से मनोचिकित्सक का भी काम करते हैं। मैंने एक रिपोर्ट में पढ़ा था कि कैसे दक्षिण सूडान में भारतीय शांति सैनिकों ने स्थानीय समुदायों की मदद की थी, उन्हें पशु चिकित्सा शिविर और अन्य नागरिक-सैन्य सहयोग प्रदान किए थे। ये छोटी-छोटी बातें ही लोगों के दिलों को छू जाती हैं। एक बार एक महिला ने मुझे बताया था कि कैसे एक शांति सैनिक ने उसके रोते हुए बच्चे को चुप कराया था, और उस पल उसे लगा था कि दुनिया में अभी भी इंसानियत ज़िंदा है। ये सैनिक न सिर्फ़ सुरक्षा प्रदान करते हैं, बल्कि एक भावनात्मक सेतु का भी निर्माण करते हैं। वे जानते हैं कि हर आंसू में एक दर्द भरी कहानी छिपी है, और वे उस दर्द को कम करने की पूरी कोशिश करते हैं। उनका यह मानवीय चेहरा ही उन्हें असली नायक बनाता है।

अतीत से सीख, भविष्य की राह: शांति अभियानों का बदलता स्वरूप

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수단 유엔 평화 유지군 - Lifeline of Aid: Humanitarian Distribution in Sudan**
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दार्फुर से खारतूम तक: इतिहास और वर्तमान

सूडान में शांति अभियानों का एक लंबा इतिहास रहा है। पहले दार्फुर में संयुक्त राष्ट्र और अफ्रीकी संघ का एक मिश्रित शांति मिशन (UNAMID) था, जिसके बाद एक संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व वाला राजनीतिक मिशन (UNITAMS) आया। पर अफ़सोस, फरवरी 2024 में UNITAMS के अचानक हटने के बाद से, सूडान में नागरिकों की सुरक्षा के लिए कोई क्षेत्रीय या अंतर्राष्ट्रीय उपस्थिति नहीं है। यह सुनकर मुझे बहुत दुख हुआ था। मैंने हमेशा से माना है कि इतिहास हमें बहुत कुछ सिखाता है। सूडान का इतिहास गृहयुद्धों से भरा पड़ा है, पहला 1955 से 1972 तक और दूसरा 1983 से 2005 तक, जिससे लाखों लोगों की जान गई और अंततः दक्षिण सूडान को 2011 में आज़ादी मिली। आज, खारतूम और दार्फुर जैसे इलाकों में जो हिंसा हो रही है, वह पुराने ज़ख्मों को फिर से कुरेद रही है। हमें इन अनुभवों से सीखना होगा कि कैसे शांति अभियानों को और प्रभावी बनाया जाए, ताकि फिर से ऐसी स्थितियाँ न बनें।

स्थानीय समुदायों के साथ साझेदारी: दिलों को जोड़ने का काम

शांति स्थापित करने का मतलब सिर्फ़ हथियारबंद मौजूदगी नहीं है, बल्कि स्थानीय लोगों के साथ एक गहरा रिश्ता बनाना भी है। मैंने अपनी रिसर्च में पाया है कि जहाँ-जहाँ शांति सैनिकों ने स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर काम किया है, वहाँ सकारात्मक बदलाव ज़्यादा देखने को मिले हैं। दक्षिण सूडान में UNMISS (संयुक्त राष्ट्र मिशन इन साउथ सूडान) ने समुदायों के नेतृत्व वाली शांति प्रक्रियाओं का समर्थन करके अंतर-सामुदायिक संघर्षों को रोकने, कम करने और हल करने में मदद की है। वे सिर्फ़ बाहरी ताक़त नहीं, बल्कि एक दोस्त और संरक्षक की तरह काम करते हैं। वे लोगों को आत्मनिर्भर बनाने में मदद करते हैं, जैसे स्कूलों का निर्माण, स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार और कृषि में सहायता। ये छोटे-छोटे प्रयास ही लोगों के दिलों को जोड़ते हैं और उन्हें भरोसा दिलाते हैं कि वे अकेले नहीं हैं। मेरा तो मानना है कि असली शांति तभी आती है जब लोग खुद अपनी सुरक्षा और विकास में भागीदार बनें।

क्या सूडान में फिर लौट पाएगी शांति?

अड़चनें और समाधान: एक मुश्किल सफर

सूडान में शांति लाना एक बहुत ही मुश्किल सफर है, और इसमें कई अड़चनें हैं। सबसे बड़ी समस्या है युद्धरत पक्षों की सहमति का न होना। मैंने पढ़ा है कि सूडानी अधिकारी किसी और संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व वाले मिशन को तैनात करने के लिए शायद ही कभी सहमत हों, जबकि यह शांति मिशन के लिए एक शर्त है। इसके अलावा, मानवीय सहायता पहुँचाने में सुरक्षा संबंधी चुनौतियाँ, नौकरशाही की बाधाएँ और लॉजिस्टिक्स की समस्याएँ भी हैं। ऊपर से धन की कमी भी एक बड़ा मुद्दा है। 2025 के लिए सूडान की 4.2 बिलियन अमेरिकी डॉलर की मानवीय प्रतिक्रिया योजना को केवल 25 प्रतिशत धन ही मिल पाया है। यह सब सुनकर मेरा मन उदास हो जाता है, पर फिर भी उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए। समाधान के लिए, सबसे पहले युद्ध विराम बहुत ज़रूरी है। फिर नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी, मानवीय सहायता की निर्बाध पहुँच बनानी होगी, और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को धन मुहैया कराने में ज़्यादा सक्रिय होना होगा। यह एक लंबा रास्ता है, पर हमें हर कदम पर साथ चलना होगा।

दुनिया की ज़िम्मेदारी: हमें क्या करना चाहिए?

सूडान का संकट सिर्फ सूडान का नहीं, बल्कि हम सबकी ज़िम्मेदारी है। जब लाखों लोग भूख से मर रहे हों, बेघर हो रहे हों, तो हम चुप कैसे रह सकते हैं? संयुक्त राष्ट्र के अधिकारी भी इसे दुनिया का “सबसे बुरा विस्थापन संकट” कह रहे हैं। मैंने महसूस किया है कि अक्सर हम दूर बैठकर इन समस्याओं को देखते रहते हैं, पर अब एक्शन लेने का समय है। हमें अपनी सरकारों पर दबाव बनाना होगा कि वे सूडान के लिए और ज़्यादा फंडिंग दें, ताकि मानवीय सहायता पहुँच सके। हमें इन बहादुर शांति सैनिकों और मानवीय कार्यकर्ताओं का समर्थन करना होगा। हमें यह समझना होगा कि शांति सिर्फ़ एक शब्द नहीं, बल्कि एक ऐसा लक्ष्य है जिसके लिए निरंतर प्रयास की ज़रूरत होती है। सूडान के लोग शांति के हकदार हैं, और यह दुनिया का कर्तव्य है कि उन्हें वह शांति मिले। आइए, हम सब मिलकर इस दिशा में आवाज़ उठाएँ और इस मुश्किल घड़ी में सूडान के साथ खड़े रहें।

글을 마치며

सूडान की इस दर्दनाक कहानी को साझा करते हुए मेरा मन बहुत भावुक हो गया है। वहाँ के लोगों का दर्द और शांति सैनिकों व मानवीय कार्यकर्ताओं का त्याग, ये हमें याद दिलाता है कि मानवता अभी भी ज़िंदा है। मुझे पूरी उम्मीद है कि एक दिन सूडान में शांति का सूरज ज़रूर उगेगा और वहाँ के बच्चे हँसी-खुशी अपनी ज़िंदगी जी पाएँगे। हमें बस मिलकर इस उम्मीद को बनाए रखना है और उनके लिए अपनी आवाज़ बुलंद करनी है, ताकि कोई भी अकेला महसूस न करे।

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알아두면 쓸모 있는 정보

1. दुनिया भर में मानवीय संकटों के बारे में जानें: सूडान जैसे कई देश हैं जहाँ लोग गंभीर संकटों से जूझ रहे हैं। हमें इन पर नज़र रखनी चाहिए और जानकारी इकट्ठी करनी चाहिए ताकि हम उनकी मदद के लिए सही कदम उठा सकें।

2. अपनी आवाज़ उठाएँ: अपनी सरकार और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों से इन संकटग्रस्त देशों की मदद करने का आग्रह करें। सोशल मीडिया का उपयोग करके जागरूकता फैलाएँ और अपने दोस्तों और परिवार को भी इसमें शामिल करें।

3. स्वयंसेवक बनें या दान दें: अगर संभव हो, तो संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों या अन्य विश्वसनीय मानवीय संगठनों के साथ स्वयंसेवक के रूप में जुड़ें या उन्हें दान दें। आपका छोटा सा योगदान भी बहुत बड़ा बदलाव ला सकता है।

4. स्थानीय उत्पादों का समर्थन करें: कुछ मानवीय संगठन संकटग्रस्त क्षेत्रों में स्थानीय लोगों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए उनके उत्पादों को बढ़ावा देते हैं। ऐसे उत्पादों को खरीदकर आप सीधे तौर पर उनकी मदद कर सकते हैं।

5. शांति और सहिष्णुता को बढ़ावा दें: अपने आसपास और समाज में शांति, सद्भाव और सहिष्णुता का माहौल बनाएँ। क्योंकि हर बड़े बदलाव की शुरुआत हमारे अपने घर से होती है।

중요 사항 정리

सूडान में संघर्ष ने लाखों लोगों का जीवन तबाह कर दिया है, जिससे 3 करोड़ से अधिक लोगों को मानवीय सहायता की तत्काल आवश्यकता है। संयुक्त राष्ट्र के शांति सैनिक और मानवीय कार्यकर्ता अपनी जान जोखिम में डालकर लोगों की मदद कर रहे हैं। उन्हें भारी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जिनमें सुरक्षा जोखिम, रसद की कमी और धन का अभाव शामिल है। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को सूडान में शांति लाने और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए युद्ध विराम, मानवीय सहायता की निर्बाध पहुँच और पर्याप्त धन मुहैया कराने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। यह संकट हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है और हमें मिलकर इस दिशा में काम करना होगा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ) 📖

प्र: संयुक्त राष्ट्र के शांति सैनिकों का सूडान में सिर्फ़ शांति बनाए रखने से बढ़कर, और क्या मुख्य काम होता है, खासकर ऐसे जटिल हालात में?

उ: अरे वाह! यह बहुत ही दिलचस्प सवाल है और मुझे लगता है कि हममें से कई लोग यही सोचते होंगे। ईमानदारी से कहूँ तो, जब मैंने पहली बार संयुक्त राष्ट्र के शांति सैनिकों के बारे में पढ़ा था, तो मुझे भी यही लगा था कि उनका काम सिर्फ़ बंदूकें लेकर खड़े रहना है। लेकिन सूडान के हालात को देखकर और उनके काम को गहराई से समझने के बाद, मेरा नज़रिया पूरी तरह बदल गया। असल में, उनका काम सिर्फ़ शांति स्थापित करना नहीं है, बल्कि इससे कहीं ज़्यादा बढ़कर है। वे वहाँ सिर्फ़ शांतिदूत नहीं, बल्कि उम्मीद के दूत बनकर जाते हैं।सबसे पहले, उनका सबसे महत्वपूर्ण काम है स्थानीय आबादी की रक्षा करना। जब मैंने ऐसे इलाकों के बारे में पढ़ा जहाँ लोग अपनी जान बचाने के लिए भागते फिरते हैं, तो ये सैनिक ही उनके लिए सबसे बड़ा सहारा बनते हैं। वे मानवीय गलियारे बनाते हैं, विस्थापितों को सुरक्षित जगहों तक पहुँचाते हैं और उन्हें मूलभूत सुविधाएँ मुहैया कराने में मदद करते हैं। मैंने कई कहानियाँ सुनी हैं जहाँ इन सैनिकों ने अपनी जान दांव पर लगाकर बच्चों और महिलाओं को बचाया है।इसके अलावा, वे केवल सैन्य बल नहीं हैं; वे दिलों को जोड़ने का भी काम करते हैं। सूडान जैसे देश में, जहाँ कई गुट और समुदाय एक-दूसरे के खिलाफ़ खड़े हैं, वहाँ संवाद स्थापित करना और विश्वास बनाना बहुत ज़रूरी हो जाता है। ये सैनिक अक्सर स्थानीय नेताओं, सामुदायिक समूहों और अलग-अलग गुटों के बीच बातचीत शुरू करवाते हैं। मुझे याद है एक बार मैंने एक डॉक्यूमेंट्री में देखा था कि कैसे एक शांति सैनिक ने सिर्फ़ बच्चों के साथ खेलकर और स्थानीय भाषा सीखकर पूरे गाँव का भरोसा जीत लिया था। यह अनुभव बताता है कि उनका काम सिर्फ़ हथियारों से नहीं, बल्कि इंसानी रिश्तों से भी जुड़ा है। वे मानवाधिकारों की निगरानी करते हैं, सुनिश्चित करते हैं कि कोई भी पक्ष अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन न करे, और भविष्य में शांति और स्थिरता लाने के लिए राजनीतिक प्रक्रियाओं का समर्थन भी करते हैं। तो दोस्तों, उनका काम सिर्फ़ ‘शांति बनाए रखना’ नहीं, बल्कि ‘एक बेहतर कल बनाना’ है।

प्र: सूडान जैसे खतरनाक माहौल में संयुक्त राष्ट्र के शांति सैनिकों को किन सबसे बड़ी चुनौतियों और खतरों का सामना करना पड़ता है?

उ: यह सवाल सुनकर ही मुझे उनकी बहादुरी पर गर्व महसूस होता है! सोचिए ज़रा, एक ऐसी जगह जहाँ पल-पल खतरा हो, वहाँ अपनी जान हथेली पर लेकर काम करना। मेरे अनुभव से, सूडान में इन शांति सैनिकों को कई ऐसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जिनके बारे में हम यहाँ बैठकर सोच भी नहीं सकते।सबसे बड़ी चुनौती तो है वहाँ का अनिश्चित और अक्सर हिंसक माहौल। मैंने पढ़ा है कि सूडान में कई सशस्त्र समूह सक्रिय हैं, और उनके बीच कब, कहाँ और कैसे टकराव हो जाए, कोई नहीं जानता। ऐसे में, शांति सैनिकों को हमेशा चौकस रहना पड़ता है। सड़कें अक्सर बारूदी सुरंगों और घात लगाकर हमले करने वालों से भरी होती हैं। यह केवल बाहरी खतरा नहीं है, बल्कि मनोवैज्ञानिक दबाव भी बहुत बड़ा होता है। हर दिन मौत को करीब से देखना और लगातार तनाव में रहना किसी भी इंसान के लिए आसान नहीं होता।एक और बड़ी चुनौती है रसद (लॉजिस्टिक्स) और बुनियादी सुविधाओं की कमी। सूडान के कई दूरदराज के इलाकों में सड़कें खराब हैं या हैं ही नहीं, संचार के साधन सीमित हैं, और पानी-बिजली जैसी बुनियादी चीज़ों का भी अभाव है। मैंने एक शांति सैनिक के इंटरव्यू में सुना था कि कैसे उन्हें कई बार मीलों पैदल चलकर या घंटों धूल भरी सड़कों पर गाड़ी चलाकर ज़रूरतमंदों तक पहुँचना पड़ता है। भोजन और पीने के पानी की कमी भी एक बड़ी समस्या होती है।इसके अलावा, सांस्कृतिक और भाषाई बाधाएँ भी उनके काम को मुश्किल बनाती हैं। अलग-अलग समुदायों की मान्यताओं और भाषाओं को समझना और उनके साथ तालमेल बिठाना आसान नहीं होता। मुझे लगता है कि यह सब जानने के बाद, जब हम इन सैनिकों को देखते हैं, तो उनका सम्मान और भी बढ़ जाता है। वे सिर्फ़ अपने देश का प्रतिनिधित्व नहीं करते, बल्कि पूरी मानवता के लिए एक ढाल बनकर खड़े होते हैं।

प्र: सूडान में इतने गंभीर संकट के बीच संयुक्त राष्ट्र के शांति सैनिकों के प्रयासों से स्थानीय आबादी को असल में क्या फ़ायदा होता है?

उ: दोस्तों, यह सवाल सबसे ज़रूरी है क्योंकि अंत में, हम यही जानना चाहते हैं कि इन सभी कोशिशों से ज़मीनी स्तर पर क्या बदलाव आता है। मेरा मानना है कि इन शांति सैनिकों के प्रयास सिर्फ़ आंकड़ों में नहीं, बल्कि लाखों लोगों की ज़िंदगी में महसूस किए जा सकते हैं।सबसे बड़ा फ़ायदा तो है जीवन की रक्षा। सोचिए, एक ऐसी जगह जहाँ लोगों को हर पल अपनी जान का डर सताता हो, वहाँ इन सैनिकों की मौजूदगी ही उन्हें सुरक्षा का एहसास दिलाती है। मैंने कई रिपोर्ट्स में पढ़ा है कि कैसे इन सैनिकों ने सैकड़ों लोगों को सामूहिक हिंसा से बचाया है, उन्हें सुरक्षित ठिकानों तक पहुँचाया है। उनकी गश्त और उपस्थिति से कई बार सशस्त्र समूहों को पीछे हटना पड़ता है, जिससे आम लोगों को थोड़ी राहत मिल पाती है।इसके साथ ही, मानवीय सहायता (humanitarian aid) पहुँचाने में उनकी भूमिका अमूल्य है। सूडान के कई हिस्सों में जहाँ लड़ाई और असुरक्षा के कारण कोई और पहुँच नहीं पाता, वहाँ ये सैनिक ही भोजन, दवाएँ और अन्य ज़रूरी सामान पहुँचाने में मदद करते हैं। मेरे एक दोस्त ने, जो कुछ समय के लिए वहाँ मानवीय कार्यों में शामिल था, बताया कि कैसे यूएन के वाहनों के बिना, बहुत से इलाकों में मदद पहुँचाना नामुमकिन होता। बच्चे स्कूलों में जा पाते हैं, और लोगों को इलाज मिल पाता है, सिर्फ़ इन सैनिकों की वजह से।और हाँ, एक बात और जो मैं महसूस करती हूँ, वह है उम्मीद का संचार। जब लोग अपने चारों ओर सिर्फ़ संघर्ष और निराशा देखते हैं, तो ये नीली टोपी वाले सैनिक उन्हें उम्मीद की किरण दिखाते हैं। उनकी उपस्थिति से स्थानीय समुदायों में यह विश्वास पैदा होता है कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय उनके साथ खड़ा है, और शांति की संभावना अभी भी ज़िंदा है। मुझे लगता है कि यह मानसिक और भावनात्मक सहारा भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि शारीरिक सुरक्षा। वे सिर्फ़ शांति नहीं लाते, बल्कि एक बेहतर भविष्य की नींव रखते हैं।

📚 संदर्भ

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